ज़िन्दगी के सफ़र में गुजर जाते हैं ओह मुकाम ओह फिर नहीं आते..........................................,
मैं इस कद्र परेसान होता हूँ जैसे की.............................................................................,
खुदा भी बचाए मेरे दोस्तों से ...................................................................................,
इस कद्र इम्तहान होता है पता बाद में दोस्तों से चलता हैं । .................................................,
दोस्त अछे मिलते नहीं दोस्ती अछि होती हैं ....................................................................,
...................................................................................................................,
आपका अपना ..................................,
रमण
Saturday, September 3, 2011
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